दिया भी फूँक के मैं दूर से बुझाता हूँ ,
मुझ पे डर इस तरह से है तारी
मैं लिपटा हूँ सूखे पत्तों से हर तरफ लेकिन,
शुक्र है भड़कती नहीं है चिंगारी ।
मुझ पे डर इस तरह से है तारी
मैं लिपटा हूँ सूखे पत्तों से हर तरफ लेकिन,
शुक्र है भड़कती नहीं है चिंगारी ।
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