Saturday, July 17, 2010

अनाम

खेत खलिहानों के बीचों बीच
खड़े होकर देखा आकाश को
अद्भुत प्रयास था धरती को छूने का
अथक पर असफल
क्या मेरे साथ भी ऐसा होगा कल ?
बताओ ना...
क्या हर बार प्यार में ऐसा ही होता है ?
शायद हर लम्हा हर पल
इसीलिए तो कहता हूँ ,
मत दो इस रिश्ते को कोई नाम
और जीता हूँ
चुपचाप...
रिश्ता ये अनाम

आहिस्ता

आज हँस रहा हूँ ये कविता पढ़ कर, जिसे लिखते वक़्त खूब रोया था।

उस वक़्त जब मैं था , शायद तुम भी थी
मैं और तुम तो थे
पर हम नहीं
हम का अहसास जगा अहिस्ता...
रोज मिलते थे , होती थी बातें भी
दिन साथ थे , ख्वाबों में साथ थी रातें भी,
पर लफ़्ज न मिले अहसास को
और गम का दीदार हुआ अहिस्ता...

Friday, July 16, 2010

कविता की पहली खेप

वो...

चीजें अच्छी होती हैं बहुत सारी

पर होती हैं उनमे से कुछ खास

कुछ जरूरते, तो कुछ चाहतें

कुछ मिल गयी हैं, पर कुछ हैं अनछुई

...वो भी अच्छी है

न खास, न जरुरी

मिली भी नहीं, ना है अभी अनछुई

पर कुछ तो है,

आखिर वो जो है

Monday, March 22, 2010

हलफा

हवा में रहेगी मेरे ख़याल की बिजली
ये मुश्ते ख़ाक है फानी,रहे,रहे न रहे

सबसे पहले हलफा के बारे मे,ये भोजपुरी में इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है,अर्थ है हंगामा
अभी इतना ही ........................................................................