Thursday, September 15, 2011

मेरा चाँद

यादें जब से याद रहने लगीं,
तब से याद है चाँद
याद है मुझे,
कि पहले वो सिर्फ मेरा था
उसकी ठंढी रौशनी,
सिर्फ मेरे लिए धरती तक आती थी

मेरे ही पीछे पड़ा रहता था,
चेपू साला
कहीं भी जाऊं, वो मेरे साथ होता था
तो चलो...
मुझे भी प्यार हो ही गया उससे

पर भला हो उन किताबों का,
जिन्होंने मुझे चाँद कि सच्चाई बताई
उम्र करोड़ वर्ष,
आकार
मेरी कल्पनाओं से कहीं ज्यादा बड़ा,
और इससे कहीं बड़ी बात
की वो मेरे नहीं,
धरती के चारों ओर घूमता है
उसकी सारी शीतलता,
धरती की गर्मी के लिए है

मैं ठगा सा खड़ा हूँ सब कुछ जान कर
चाहता तो हूँ कि चाँद का इतिहास मिटा दूं
उसे आज पैदा करूँ, सिर्फ अपने लिए,
या फिर मान लूं कि किताबें झूठी हैं
सच वही है जो मैंने जिया है. 



Friday, April 22, 2011

चलते चलते

एक दिन मैं चला
बस यूँ ही चल दिया
चलना अच्छा लगा
तो फिर बढ़ा
चलना भी और अच्छा लगना भी
सिर्फ मैं ही नहीं रास्ता भी चला मेरे साथ
सिर्फ मुझे ही नहीं
उसे भी अच्छा लगा
फिर मैं कुछ तेज चला
इतना तेज कि रस्ते को लगा
मैं दौड़ रहा हूँ

वो अब भी चल रहा था
पर मैं अब दौड़ रहा था
इतनी तेज कि मुझे लगा
वो रुक गया है
अब वो चले तब तो चलूँ
वो कहे तब तो बढूँ

पर वो दूर कहीं पीछे
कुछ कह रहा है
मैं दूर कहीं आगे
कुछ सोच रहा हूँ
सोच रहा हूँ कि
मैं तो चला ही था
रुकने के लिए
अरे भाई
मैं तो दौड़ा ही था
रुकने के लिए ...