HALFAA
Thursday, November 29, 2012
मुझे क़ुबूल है वो पल जो तेरी राह तकता है,
नहीं जँचता वो ख़ालीपन जो तेरे बाद बचता है ।
ओस की बूँदें जब उड़ने लगती हैं
भाप बन के,
भीतर का शैतान सो जाता है
अपने अगले रतजगे के लिए ।
अभी
सोच नहीं रहा था,
महसूस कर रहा था
स्पर्श,
ख्याल में कुछ नहीं था
बीती हुई कोई बात नहीं,
बस वर्तमान था ।
डर
दिया भी फूँक के मैं दूर से बुझाता हूँ ,
मुझ पे डर इस तरह से है तारी
मैं लिपटा हूँ सूखे पत्तों से हर तरफ लेकिन,
शुक्र है भड़कती नहीं है चिंगारी ।
मैं तोड़ता रहता हूँ , रोज कुछ न कुछ
आज भी मैंने कुछ लकीरें तोड़ीं
जो उसके शरीर से होकर गुज़र रहीं थी,
कुछ हदें तोड़ीं
जो गुजरने से रोक रहीं थीं .
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