Saturday, July 17, 2010

आहिस्ता

आज हँस रहा हूँ ये कविता पढ़ कर, जिसे लिखते वक़्त खूब रोया था।

उस वक़्त जब मैं था , शायद तुम भी थी
मैं और तुम तो थे
पर हम नहीं
हम का अहसास जगा अहिस्ता...
रोज मिलते थे , होती थी बातें भी
दिन साथ थे , ख्वाबों में साथ थी रातें भी,
पर लफ़्ज न मिले अहसास को
और गम का दीदार हुआ अहिस्ता...

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